Saturday, December 5, 2009

My poem, written in 2003

मैं हूँ ना
हवा के हर उस झोकें में, जो तुम्हे छू जाता है.
सूर्य की हर उस किरण में, जो तुम्हारा स्पर्श करती है.
प्रकाश के हर उस कण में, जो तुम्हारा मार्ग आलोकित करता है.
संगीत की हर उस तरंग में, जो तुम्हारे कानो पर दस्तक देती है.

मैं हूँ ना.
हर उस सुगंध में, जो तुम्हे मुग्ध करती है.
हर उस स्पर्श में, जो तुम्हे रोमांचित करता है.
हर उस आकृति - हर उस चित्र में, जो तुम्हे मनोरंजित करता है.
हर उस बात - हर उस तथ्य में जो तुम्हे आस्वाषित करता है.

मैं हूँ ना
तुम्हारे सांसों के प्राण वायु में.
तुम्हारे आंखों की अविस्वस्निये चमक में.
तुम्हारे होंठों की शांत भंगिमाओं में.
तुम्हारी वाणी के प्रबल विश्वस्त आवेग में.

मैं हूँ ना
तुम्हारी खुशी में.
तुम्हारे हौसले में.
तुम्हारी सहिशुनुता में.
तुम्हारे विश्ववास में.

मैं हूँ ना हमेशा
तुममे...